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डॉ. आरुषि बताती हैं कि केंद्र-प्रदेश सरकारें डॉक्टर्स व अन्य कोरोना वॉरियर्स की मौत पर 50-50 लाख रुपए मुआवजा देने को तैयार हैं
मेरा मानना है कोविड हैल्थ वर्कर्स जिंदा हैं, तभी उनका पूरा ख्याल क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? मरने की नौबत आने ही क्यों दी जाए?

ये उदयपुर की डॉ. आरुषि जैन हैं। डॉ. आरुषि सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड मिठू जैन के जरिए देशभर के फ्रंट लाइन कोरोना वॉरियर्स (आठ लाख डॉक्टर्स व अन्य हैल्थ वर्कर्स) व उनके परिजनों की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। डॉ. आरुषि बताती हैं कि केंद्र-प्रदेश सरकारें डॉक्टर्स व अन्य कोरोना वॉरियर्स की मौत पर 50-50 लाख रुपए मुआवजा देने को तैयार हैं। लेकिन मेरा मानना है कोविड हैल्थ वर्कर्स जिंदा हैं, तभी उनका पूरा ख्याल क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? मरने की नौबत आने ही क्यों दी जाए? जब कोरोना वॉरियर अपनी जान जोखिम में डालकर संक्रमितों की जिंदगी बचाने में जुटे हैं तो उन्हें होटल व अन्य संस्थागत क्वारेंटाइन सेंटर्स में क्वारेंटाइन करने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

अगर कोरोना वॉरियर ही कोरोना कैरियर बन जाएंगे तो पूरे देश का हैल्थ सिस्टम ठप हो जाएगा। किसी के माता-पिता ने अपने बच्चे को डॉक्टर बनाकर गुनाह नहीं किया है कि वे उनके लिए ही कोरोना कैरियर बन जाएं। डॉ. आरुषि बताती हैं कि केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन में कोरोना वॉरियर्स के लिए हाई और लॉ रिस्क कैटेगरी तय की गई है। जब यह अंदाजा ही नहीं है कि कोरोना वायरस का नेचर क्या है और वह किसकी बॉडी में कैसा ट्रीट करेगा तो कैटेगरी कैसे बांटी जा सकती हैं? इधर, क्वारेंटाइन प्रभारी डॉ. राहुल जैन बताते हैं कि उदयपुर में कोरोना हैल्थ वर्कर्स को होटलों में क्वारेंटाइन कराने के लिए कलेक्टर आनंदी ने पुख्ता इंतजाम शुरू से ही करवा रखे हैं। डॉ. जैन का दावा है कि उदयपुर मॉडल देशभर में एक मिसाल बन सकता है। उदयपुर के एक निजी मेडिकल कॉलेज में डर्मेटोलॉजी में एमडी कर रही डॉ. आरुषि से बातचीत…

केंद्र और राज्य सरकारों ने आदेश जारी कर रखे हैं कि किसी भी कोरोना वॉरियर्स की मौत पर 50 लाख मुआवजा दिया जाएगा?
-मरने के बाद मुआवजा देने से बेहतर है जान बचाने के लिए बेहतर प्रबंधन करना। संक्रमितों का इलाज करने वाले या संक्रमितों के संपर्क में आने वाले डॉक्टर भी अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर किसी ने चिकित्सक के पेशे को चुना है, इसलिए कोरोना से उसकी मौत हो गई, लेकिन उसके माता-पिता, पत्नी-बच्चों ने तो यह पेशा नहीं चुना है। अगर डॉक्टर के संपर्क में आने से उसके परिवार के किसी सदस्य की जान चली गई तो कौन, क्या दे देगा? किसी भी माता-पिता ने अपने बच्चे को डॉक्टर बनाकर गुनाह नहीं किया है कि वे उनके लिए ही कोरोना कैरियर बन जाएं।

आप फ्रंट लाइन वॉरियर भी नहीं हैं फिर सुप्रीम कोर्ट क्यों गईं?
-खबर पढ़ी थी कि इंदौर में स्क्रीनिंग करने पहुंची चिकित्सा टीम पर पथराव हुआ। ऐसा व्यवहार तो जानवरों से भी नहीं करते हैं। मुझे बहुत दुख हुआ, क्योंकि जो डॉक्टर अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचाने में जुटे हैं, उन्हें पत्थरों से मारना कतई सही नहीं है। ये सिर्फ इंदौर की बात नहीं है, पूरे देश का मसला है। मैंने कोरोना वॉरियर्स के लिए पुलिस प्रोटेक्शन की मांग के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद डॉक्टर्स के लिए पुलिस प्रोटेक्शन मुहैया कराने के आदेश भी जारी किए गए।
हैल्थ वर्कर्स को संस्थागत क्वारेंटाइन कराने का विचार कैसे आया?
-भोपाल सहित अन्य कई जगहों से खबर मिली कि डॉक्टर को ठहराने के लिए संस्थागत क्वारेंटाइन की पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई है। भोपाल के एक डॉक्टर ने पूरी रात कार में गुजारी, क्योंकि कोरोना ड्यूटी देने वाले डॉक्टर्स व अन्य चिकित्सा स्टाफ को 14-14 दिन के लिए क्वारेंटाइन कराने की व्यवस्था नहीं की गई। अगर क्वारेंटाइन की व्यवस्था नहीं की तो स्वस्थ दिखने वाले संक्रमित चिकित्सक के संपर्क में आने परिजन भी कोरोना की चपेट में आ जाएंगे। चिकित्सकों के बच्चे, बुजुर्ग माता-पिता आदि के लिए नया संकट पैदा हो गया है। कोदेश के हैल्थ वर्कर्स को न्याय दिलाने के लिए दिल-जान से जुटी हुई हूं
रोना महामारी के बीच डॉ. आरुषि में हैल्थ वर्कर्स और उनके परिजनों की सुरक्षा का जुनून देखा तो मैं भी जी-जान से इस मामले में जुटी हुई हूं। 15 मई की नई गाइडलाइन में कोविड ड्यूटी देने वाले डॉक्टरों के लिए 14 दिन का क्वारेंटाइन खत्म कर दिया गया है। हमारी जान बचाने वाले कई डॉक्टर कोविड की ड्यूटी करने के बाद अपने घर बुजुर्ग-छोटे बच्चों के पास जा रहे हैं। अगर काेविड ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों को क्वारेंटाइन नहीं देंगे तो उनके परिवार में भी कोरोना संक्रमण हो सकता है। इनकी सुरक्षा भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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