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विश्व बाघ दिवस आज….
बून्दी के जंगलों में फिर से गूंजेगी बाघों की दहाड़
मुख्यमंत्री की बजट घोषणा पर बून्दी में प्रदेश का चौथा  टाइगर रिजर्व बनाने की तेज हुई कयावद
बून्दी.

हमारे राष्ट्रीय पशु एव जंगल के राजा बाघ के मेटरनिटी-होम के रूप में विख्यात राजस्थान का प्रसिद्ध ’रामगढ़ विषधारी वन्यजीव अभयारण्य’ व बून्दी जिले के समृद्ध जंगल राज्य के चौथे टाइगर रिजर्व बनने की ओर अग्रसर है और उम्मीद है कि शीघ्र ही बून्दी को उसका खोया हुआ गौरव फिर से प्राप्त होगा। बून्दी के वन व रामगढ़ अभयारण्य सदियों से बाघों के उत्तम आश्रयस्थल रहै है। यहां का उत्तम प्राकृतिक वातावरण व बीच में बहने वाली मेज नदी की खूबसूरत वादियों ने ही इसे भारत का एक प्रमुख अभयारण्य होने का गौरव प्रदान किया है। एक दशक तक बाघ विहीन रहने के बाद अब फिर से यह अभयारण्य बाघों के स्वागत के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो गया है। जून के अंतिम सप्ताह में रणथंभोर टाइगर रिजर्व से चलकर एक बाघ के यहां पहुंचने के बाद वन्यजीव प्रेमियों एवं वन विभाग को उम्मीद जगी है कि शीघ्र ही यह महत्वपूर्ण वन क्षेत्र फिर से बाघों से आबाद होगा । गौरतलब है कि वन विभाग के कठिन परिश्रम व टी 62 व टी 91 बाघों के यहाँ आने के बाद अभयारण्य का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अभी यहां स्वतः चलकर आया T 98 बाघ अपनी टेरेटरी बना रहा है और विभाग शीघ्र ही यहाँ बाघिन छोड़ने की तैयारी कर रहा है। रामगढ़ में बाघों के लगातार मूवमेंट से यहां विभाग भी सतर्क होकर जंगल को बाघों के अनुकूल बनाने में जुटा हुआ है। नियमित गश्त व शिकारियों पर प्रभावी नकेल कसने से बाघ के लिए प्रे-बेस बढ़ने लगा है। चीतल व सांभर की तादात में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली के राष्ट्रपति भवन से भी सांभर चीतल लाकर यहां छोड़े गए हैं जिन का कुनबा भी अब बढ़ने लगा है। रामगढ़ महल के आसपास के बड़े वन क्षेत्र से विलायती बंबूल को हटा दिया गया है ताकि बाघों के स्वछंद विचरण में बाधा उत्पन्न नहीं हो। साथ ही यहां पर घास का मेदान विकसित किया जा रहा है। अभयारण्य में बाघ आने व इसे टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने की योजना से अब उम्मीद है कि यहाँ बाघों का कुनबा बढ़ेगा तथा जंगल में शांत हुई बाघों की दहाड़े फिर से गूंजेगी तथा बूंदी को इसका खोया हुआ गौरव वापस हासिल हो सकेगा। इससे बूंदी में इको टुरिज्म के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढेंगे तथा युवाओं व स्थानिय लोंगों को रोजगार मिलेगा। गोरतलब है कि बूंदी रियासत के हाड़ा वंशीय राजाओं के समय बाघों सहित सभी वन्यजीवों के शिकार पर पूर्ण पाबंदी थी और इसके चलतें आम शिकारी जंगल में किसी भी वन्यजीव का शिकार करने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। 1880 में बागडोर संभालने वाले राम सिंह हाड़ा बाघ प्रेमी शसक हुए जिन्होने मेज नदी किनारे जंगल में एक महल का निर्माण करवाया जहां से राजा बाघों को निहारा करते थे। देश की आजादी तक बूंदी सहित हाड़ौती में बाघों सहित सभी प्रजाति के वन्यजीव मौजूद थे लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी के कारण बून्दी से बाघ रणथंभौर के जंगलों में चले गए। अब बूंदी जिले में स्थितियां बदली है तथा यहां के जंगल फिर से बाघों के अनुकूल हो गए है। साथ ही रणथम्भौर में बाघों की बढती संख्या को देखते हुए सरकार ने रामगढ व बूंदी के जंगलों को फिर से बाघों से आबाद करने की तैयारी कर ली है। गत बजट सत्र में मुख्यमंत्री द्वारा बूंदी के जंगलों को टाइगर रिजर्व बनाने की घोषणा पर वन विभाग ने अमल शुरू कर दिया हैं तथा बूंदी के जंगलों को प्रदेश के चौथ टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने की तैयारियां शुरू कर दी है। इस क्रम में 800 वर्ग किलोमीटर का विस्तृत प्रस्ताव राज्य सरकार को भिजवायाा जा चुका है।
जंगल व पहाड़ों पर भरे है जल के अक्षय भंडार
बूंदी जिले के वन क्षेत्र व पहाड़ी इलाकों में परम्परागत जलस्रोतों पर पानी की उपलब्धता मूक प्रणियों के जीवन का आधार बने हुए हैं। बूंदी जिले में रामगढ़-विषधारी वन्यजीव अभयारण्य में मेज नदी के अलावा दो दर्जन प्राकृतिक जल-स्रोत हैं जिनमें 12 माह पानी रहता है। इसी प्रकार जिले के दक्षिण-पश्चिम में देवझर महादेव से भीमलत महादेव के दुर्गम पहाड़ी जंगलों में भी डेढ़ दर्जन से अधिक स्थानों पर भीषण गर्मी में भी कल-कल पानी बहता रहता है। साल भर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जल उपलब्धता के चलते मूक प्रणियों के लिए बूंदी के जंगल सदियों से प्रमुख आश्रय-स्थल बने हुए हैं। इनमें से कई प्राकृतिक जल-स्रोत तो पहाड़ी की चोटियों पर है जिनमें भीषण गर्मी में भी जल प्रवाह बना रहता हैं। जल उपलब्धता के कारण जिले में भालू, पेंथर सहित अन्य वन्यजीवों का कुनबा बढा है तथा इलाका फिर से बाघों से आबाद होने लगा है।
आस्था का केंद्र बने जंगल में जल-स्रोत
जिले के सुदूर दुर्गम पहाड़ी इलाकों में गर्मियों में भी जल उपलब्धता वाले जल स्रोत जैव-विविधता के वाहक होने के साथ-साथ आम-जन के प्रमुख आस्था केंद्र के रूप में भी उभरे हैं। इनमें पहाड़ी चोटी पर स्थित कालदां माताजी का स्थान प्रमुख है जहां भीषण अकाल में भी पानी का एक बड़ा दह भरा रहता हैं तथा प्राकृतिक रूप से यहां चट्टानों से पानी निकलता है। इसी कारण इसका नाम कालदह पड़ा जो अब कालदां वन खण्ड के रूप में जाना जाता है। इसी पहाड़ी पर उमरथुणा के निकट केकत्या महादेव, सथूर के निकट देवझर महादेव, आम्बा वाला नाला, डाटूंदा के पास दुर्वासा महादेव, पारा का देवनारायण, नारायणपुर के पास धूंधला महादेव, खीण्या-बसोली के पास आम्बारोह, भीमलत महादेव, नीम का खेड़ा के पास झरोली माताजी, खेरूणा के नीलकंठ महादेव आदि स्थान सदाबहार जलयुक्त होने के कारण सदियों से ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहे व आज तक आस्था के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। इसी प्रकार जिले के रामगढ़ विषधारी वन्यजीव अभयारण्य में रामेश्वर महादेव, झर महादेव, डोबरा महादेव, गेंद का महादेव, धूंधलेश्वर महादेव, खेळ का महादेव, माण्डू का महादेव आदि स्थान जल के कारण ही प्रमुख आस्था-धाम बने हुए हैं। इसी प्रकार तलवास के सदाबहार वन क्षेत्र वह भीलवाड़ा जिले के बांका वन खंड के सीता कुंड वह भाला कुुुई जैसे महत्वपूर्ण ये प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल ही आने वाले समय में बून्दी के प्रस्तावित टाइगर रिजर्व में बाघों के प्रमुख आश्रय स्थल सिद्ध होंगे।
इनका कहना है
बूंदी में पहाड़ी तलहटियों व पहाडों के उपर पानी का प्रवाह निरन्तर एक सा बना रहने के पिछे पहाड़ों पर जल-संचय व सघन वनस्पति प्रमुख कारण है जिससे यहां की जैव-विविधता समृध बनी हुई है। बूदी के रामगढ़ अभयारण्य सहित सभी जंगलों में सांभर, चीतल व जंगली सुअरों जैसे शाकाहारी वन्यजीवों की तादात में निरंतर इजाफा हो रहा है जो बाघों के लिए अच्छा प्रे-बेस सिद्ध होंगे। राज्य के चौथे टाइगर रिजर्व के रूप में बून्दी के जंगल टाइगर के लिए उत्तम आश्रयस्थल सिद्ध होंगे तथा बून्दी जिले के युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
पृथ्वी सिंह राजावत
पूर्व मानद वन्यजीव प्रतिपालक बून्दी

hemraj

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