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कोटा

राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में शुक्रवार को तीन दिवसीय वेबीनार आउटकम एजुकेशन तथा एनबीए एक्रीडिटेशन का शुभारंभ किया। विश्वविद्यालय की फैकल्टी ने बताया कि इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के लिए देश में एनबीए एक्रीडिटेशन आवश्यक किया जा रहा है। एआईसीटीई ने निर्देशित किया है की सन 2022 तक कम से कम आधे पाठ्यक्रम एक्रेडिटेड किए जाएं। उन्होंने बताया कि देश के किसी भी विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज में इंजीनियरिंग की शिक्षा का पाठ्यक्रम एआईसीटीई से मान्यता प्राप्त होना चाहिए। इस क्रम में आरटीयू के विश्वविद्यालय विभागों में चल रहे बीटेक प्रोग्रामों में इलेक्ट्रिकल को सन 2019 जुलाई से 3 वर्ष के लिए एनबीए मान्यता मिल चुकी है। आरटीयू सत्र 2020 -21 में चार अन्य बीटेक पाठ्यक्रमों के एनबीए एक्रीडिटेशन प्राप्त करने के लिए एक्सपर्ट विजिट होने का इंतजार कर रहा है जो कि कोविड महामारी के कारण पिछले 3 माह से लंबित है । स्थिति सुधरने पर आगामी कुछ महीनों में यह आकलन एनबीए द्वारा किया जाएगा ।इस दौरान विश्वविद्यालय विभागों ने अपने शिक्षण में सुधार तथा कार्य पद्धति में एनडीए के निर्देशों के अनुसार  अपने शिक्षकों के प्रशिक्षण ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया , जिसमें पहले दिन एन बीए के सदस्य सचिव अनिल कुमार नासा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कुलपति प्रोफेसर रामावतार गुप्ता ने डॉक्टर अनिल नासा का ऑनलाइन स्वागत किया तथा विश्वास जताया कि विश्वविद्यालय एनबीए की मापदंडों पर अपने पाठ्यक्रमों को खरा उतरने में सक्षम रहेगा।

पहले दिन कुल 3 तकनीकी व्याख्यान हुए। पहले सत्र में प्रोफेसर सॉफ्ट ने एनबीए एक्रीडिटेशन संबंधी चरणों का उल्लेख कर आवश्यक प्रक्रियाओं को समझाया।

नेशनल बोर्ड आफ एक्रीडिटेशन के डॉक्टर अनिल नासा ने प्रक्रियाओं पर  मापदंडों को और विस्तार से समझाया। इसमें मुख्यतः शिक्षक छात्र अनुपात का निर्धारित सीमा में होना आवश्यक है । उन्होंने कहा कि राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय अपने यहां कोटा में चल रहे पाठ्यक्रमों को टियर में तथा अपने से संबंधित अन्य महाविद्यालयों में चल रहे पाठ्यक्रमों को टियर टू में एनबीए से एक्रेडित  करवाने में जोर दे ।उन्होंने यह भी बताया कि 60 देशों में इन पाठ्यक्रमों से निकले छात्र अपनी डिग्री से नौकरी तथा अन्य कार्यों में वरीयता पाएंगे।एक्रीडिटेशन एक प्रक्रिया है जिसमें संस्थान को अपने यहां चल रहे इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के छात्रों में कुछ पूर्व निश्चित गुण तथा परिवर्तन लाने में मदद मिलती है ।

हर कॉलेज को अपना विजन, मिशन पहले से अपने स्टेकहोल्डर से संवाद कर तथा पास आउट छात्रों के कैरियर को ध्यान में रखते हुए बनाना चाहिए। ऐसा दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर प्रीतम सिंह ग्रोवर ने समझाया। संस्थान किस दिशा में कार्य करेगा यह संस्थान में कई जगह उल्लेखित किया जाना चाहिए।

द्वितीय सत्र में आउटकम बेस्ड शिक्षण के बारे में प्रोफेसर प्रीतम सिंह जी ने विस्तार से समझाया।

उन्होंने कहा कि हमें यह आकलन करना जरूरी है कि विद्यार्थी ने क्या सीखा और कितना सीखा।

केवल शिक्षक द्वारा कक्षा में जाकर भाषण दिया जाना सीखने के लिए पर्याप्त नहीं है ।

शिक्षकों को अपना लेक्चर देने से पूर्व यह योजना बनानी चाहिए कि वे उस दिन शिक्षण के दौरान किस तरह के प्रश्न पूछेंगे । किस विषय से संबंधित रियल लाइफ एग्जांपल्स देंगे , किन टॉपिक को को फिल्म अथवा फोटोग्राफ आदि से समझाएंगे तथा किस टॉपिक के लिए उन्हें फील्ड में लेकर जाएंगे।

इन सब के साथ शिक्षक को विद्यार्थियों के साथ मिलकर यह तय करना चाहिए कि यदि वह सीख नहीं पा रहे हैं तो शिक्षण व्यवस्था में किस तरह उनके अनुरूप बदलाव किया जाए। हर स्थिति में कमजोर बच्चों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास किए जाने चाहिए ।

hemraj

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