0

मुकंदरा में ऐसे तो कैसे सुरक्षित रहेंगे बाघ?
टाइगर रिजर्व में पिछले दिनों हुई थी एमटी-3 की मौत
अवैध चरवाही, खनन, शिकार तथा मानवीय दखल चिंता

कोटा
मुकंदरा टाइगर रिजर्व में पिछले दिनों कार्डियक अटैक और लंग्स संक्रमण के कारण बाघ एमटी-3 की मौत हो गई। इस मौत के बाद वन्यजीवों से जुडेÞ लोग सवाल खडेÞ रहे है। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि विभाग द्वारा बाघ की मॉनिटरिंग में लापरवाही बरती गई। रिजर्व के अधिकारियों ने कभी एमटी-3 के व्यवहार को पढ़ने की कोशिश नहीं की। यह बाघ रणथंभौर टाइगर रिजर्व से आया था। वहां की भौतिक दशाएं और यहां से विपरित है। उनका कहना है कि मुकंदरा को पूरी तरह से संरक्षण नहीं दिया। उससे पहले इसके खुले क्षेत्र में बाघ छोड दिए गए। जबकि, इसके खुले क्षेत्र में बाघों को काफी खतरा है। सबसे बड़ी दिक्कत विस्थापन की है। करीब एक दर्जन से अधिक गांवों का विस्थापन नहीं होने से मानवीय दखल निरंतर बढ़ रहा है। एमटी-3 की जहां मौत हुई थी वहां से घाटी जागीर गांव नजदीक है। ऐसे में मानवीय दखल से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी तरह घाटी गांव के आसपास कई बार एमटी-4 बाघिन को भी देखा गया है। बाघिन ने एक बार तो गांव में आकर मवैशियों का शिकार किया था। ऐसे में विस्थापन बड़ी चिंता है। एक्सपर्ट का कहना है कि बाघों को बसाने के लिए टाइगर रिजर्व में से गांवों का विस्थापन हर हाल में करना होगा, लेकिन यहां टाइगर रिजर्व की स्थापना के सालों बाद भी विस्थापन नहीं हुआ है।
अवैध चरवाही विभाग के लिए चुनौती
टाइगर रिजर्व में पशुचारण पूर्णतया: वज्रित है। इसके बाद भी दरा, कनवास, मशालपुरा, गागरोन समेत अन्य गांवों में हजारों की संख्या में पशु टाइगर रिजर्व में घुसा देते है। रिजर्व विभाग द्वारा हर साल दीवार का निर्माण करवाया जाता है, लेकिन यह लोग बारिश के दिनों में दीवारों को तोड़ कर पशु चारण करते है। इस बार भी दर्जनों जगह दीवार तोड़ रखी है। हालांकि, वनकर्मियों द्वारा इन पर कार्रवाई की जाती है, लेकिन चरवाहे जुर्माना देकर पशु छुडाकर ले जाते है। जुर्माना भी केवल 500 रुपए प्रति पशु है, जो नाकाफी है। ऐसे में इस पर भी नियंत्रण करना होगा।
शिकार की सामने आ रही घटनाएं
मुकंदरा में शिकार की घटनाओं का निरंतर इजाफा होना भी टाइगर के लिए बड़ी चुनौती है। प्रतिबंध के बावजूद भी ऐसी घटनाएं निरंतर सामने आ रही है। दीपावली के दौरान भी गागरोन रेंज में शिकारी घुस गए थे। बाद में इनको नजदीकी गांव से पकड़ा गया था। हालांकि, साक्ष्य के अभाव में जल्द जमानत मिल गई थी। इसी तरह बाटा खोर, कछुआ,  खरगोश, हरिण के शिकार की घटनाएं भी लगातार सामने आ चुकी है। ऐसी घटनाओं से बाघों के लिए खतरा है। इसके साथ ही खनन पर भी नियंत्रण हो सका है। रिजर्व में अभी भी बजरी और पत्थर का खनन निरंतर हो रहा है। ये भी बड़ी समस्या है। एक्सपर्ट का कहना है कि मुकंदरा में टाइगर का कुनबा बढ़ाना है तो इन सभी गतिविधियों पर नियंत्रण करना होगा।

इनका कहना है।
मुकंदरा में अब कोई भी काम हो सार्वजनिक करना चाहिए। एडवाइजरी कमेटी से बराबर राय लेनी चाहिए। साथ ही हर माह मुकंदरा के विकास के लिए मीटिंग आयोजित की जाए, ताकि सभी समस्याओं पर चर्चा हो।
एचएच जैदी, सदस्य, मुकंदरा एडवाइजरी कमेटी
बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए प्री बेस वातावरण तैयार किया जाना चाहिए। गांवों का रिलोकेशन, खनन तथा पशुचारण पर नियंत्रण करना चाहिए।
डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट

गांवों का रिलोकेशन की प्रक्रिया की जा रही है। एक गांव तो पूरा मुआवजा दिया भी जा चुका है। अन्य गांवों के रिलोकेशन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। टाइगर की निरंतर मॉनिटरिंग की जा रही है। इसमें किसी भी प्रकार की कोताही नही बरती जा रही है।
डॉ टीमोहन राज, डीएफओ, मुकंदरा टाइगर रिजर्व, कोटा

hemraj

नागपंचमी विशेष: दूध पिलाने से मर जाता है सांप

Previous article

अजब प्रेम की गजब कहानी: प्यार को पाने के लिए 150 किमी दूर पहुंचा बाघ

Next article

You may also like

Comments

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More in कोटा